आजकल मैं चंदा वालों से परेशान हूं। नहीं ये चंदा मांगते नहीं, वापस करने आते हैं। अभी आज कुछ लोगों ने दरवाजा खटखटाया तो मैंने खोला। वो बोले- "गणेश उत्सव समिति से आए हैं।"
मैं पर्स से 50 का नोट निकाल कर उनको देने लगा तो उन्होंने कहा- "अरे भाई साहब, हम चंदा लेने नहीं देने आए हैं। अब बिना मांगे ही इतना चंदा इकट्ठा हो जाता है कि हमें लेने नहीं आना पड़ता। उल्टे बचा हुआ पैसा घर घर बांटने जाना पड़ता है।"
उनमें से एक आदमी रसीद पर कलम रखते हुए बोला- बताइए कितने लेने की श्रद्धा है?
मैं उनकी तरफ मुंहबाए देखने लगा। उसने फिर कहा- अरे बताइए, बताइए। धरम का काम है।
मैंने कहा- एक भी नहीं।धर्म का काम हो चाहे अधर्म का, मैं एक रुपिया नहीं ले सकता। आप चुपचाप वापस चले जाइए।
उनमें से एक बोला- धरम का पैसा नहीं लोगे? बेवकूफ हो क्या? अरे धर्म के पैसे का महात्म्य नहीं जानते ? जानते हो धरम के पैसों से कितनी बरकत होती है? चिन्दी चोर इसी धरम के पैसे से बड़े बड़े मठ बनाकर बाबा बन जाते हैं। लम्बी फोर व्हीलर गाड़ी और सैकड़ों चेले-चपाटियों के साथ ऐश करते हैं। ये धरम के पैसों का ही महात्म्य है जो चोर-उचक्कों को साधु बना देता है। मुहल्ले के आवारा लोगों के द्वारा चंदे के नाम पर इकट्ठा किया गया धरम का पैसा ही महीनों दारू का खर्चा उठाता हैं। और इसकी सबसे बड़ी महिमा कि ये टैक्स फ्री है।
महात्म्य सही भी होता है, इसे लेकर मेरे मन में शंका है। गीता में लिखा है 'कर्मण्येवा धिकारस्ते मा फलेषु कदाचन... और उसके महात्म्य में लिखा है कि गीता के प्रथम अध्याय के सुनने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उसके प्रताप से बुरे काम करने वाला पापी सुशर्मा मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। जब मोक्ष के लिए कर्म देखे ही नहीं जा रहे तो फिर कर्मण्येवा धिकारस्ते... लिखने का क्या मतलब?
इसलिए मुझे उनके बताए गए धरम के पैसों के महात्म्य पर यकीन नहीं हुआ। मैंने कहा- कुछ भी हो। मैं एक पैसा नहीं लूंगा।
वो बोले - तो हम इस बचे हुए पैसे का क्या करें?
मैंने कहा- आप लोगों ने गणेश उत्सव के काम में लापरवाही की है तभी इतना पैसा बचा है। व्यवस्था टाइट रखते और ढंग से खर्चा करते तो ये पैसा नहीं बचता। खर्चे में कंजूसी करोगे तो बचेगा ही"
मेरी बात पर वो भड़क गए। बोले- कैसी बात करते हैं। हमने पूरी व्यवस्था टाइट की थी। 8 फुट की मूर्ति लाए थे। पूरे मैदान में शानदार टेंट लगवाया। दस-दिन तक डीजे चिल्लाता रहा। पटाखे-फुलझड़ी सब में दिल खोलकर खर्चा किया। कोई कंजूसी नहीं की। समान खरीदने से ज्यादा तो लड़कों के चाय नास्ते में खर्चा किया। रोज शाम को सबको दारू भी पिलाते थे। अब इतना सब करने के बाद भी बच गए तो हम क्या करें?
उनकी बातों में सच्चाई थी। सच के आगे मैं झुक जाता हूं। लेकिन मैं न धर्म को मानता हूं न ही भगवान को। फिर भला धरम के पैसे कैसे ले लूं। किसी भी हालत में मैं अपना अधर्म भ्रष्ट नहीं कर सकता। मैंने उनसे कहा- "जो पैसा तुम्हारे पास है उसे आपस में बांटकर रख लो। मुझे परेशान न करो। तुमने कमीशन नहीं खाया, इसी वजह से पैसा बच गया है।"
उनमें से एक अकड़कर बोला- यार कैसी बातें कर रहे हो तुम। चंदा इकट्ठा करने से लेकर मूर्ति विसर्जन के किराए तक सबमें कमीशन खाया गया है। मैंने खुद 10 हजार की मूर्ति 13 हजार में खरीदवा कर 33 परसेंट कमीशन खाया। तुमको लेना पड़ेगा। (मुड़कर रसीद काटने वाले आदमी से ) अरे तुम काटो इनके नाम की।
मैंने गिड़गिड़ाकर कहा- अरे यार मेरी मजबूरी समझो। मैं नहीं ले सकता। स्टूडेंट हूं। इस पैसे को खर्चा कैसे करूँगा। नया महीना शुरू हुआ है। घर से पैसे आ गए हैं। तुम किसी जरूरतमन्द फैमिली वाले को दे दो।
उन्होंने लगभग डांटते हुए कहा- उत्सव में स्टूडेंट लोगों का ही ज्यादा सहयोग होता है। लास्ट में भंडारे में फैमिली वालों से ज्यादा तो यही रहते हैं। तुमको लेना ही पड़ेगा।
मैंने डर गया। मैंने झट से दरवाजा बन्द कर लिया। उन्होंने खूब खटखटाया पर मैंने दुबारा नहीं खोला। फिर 51 रुपए की रसीद दरवाजे के छेद से अंदर गिराकर चले गए।