शनिवार, 23 अगस्त 2025

मैत्री संबंधों का री-इवैल्यूएशन

 कभी-कभी जीवन में ऐसी नौबत आ जाती है कि हमें अपने मित्रों के साथ संबंधों का 'री-इवैल्यूएशन' करना पड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में यह काम देशों के विदेश मंत्रालय करते हैं, और व्यक्तिगत जीवन में यह काम हम जैसे धोखा खाए दोस्त करते हैं। फर्क बस इतना है कि वहां मीटिंग में चाय-कॉफी और एयरकंडीशनर होता है, और हमारी मीटिंग में ठंडी सांसें और उदासी।



आजकल मैं देख रहा हूँ कि भारत के मित्रता-संबंध भी तनाव में हैं। अमेरिका टैरिफ लगा रहा है, पाकिस्तान परमाणु धमकी दे रहा है, नेपाल सीमा पर उलझ रहा है, बांग्लादेश नाराज़ है और चीन तो हमेशा की तरह घात लगाए बैठा है। यह सब देख मुझे अपना ही दोस्त मंडली याद आती है—लगभग वैसे ही हालात हैं। फर्क बस इतना है कि दुनिया में इसको डिप्लोमेसी कहते हैं और मेरी ज़िंदगी में इसे दोस्ती निभाना।


अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के जानकार कहते हैं कि यह भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' रणनीति की नाकामी है। मेरे मित्र संयोगराज ने बड़ी गहरी बात कही थी: “जो सबका दोस्त होता है, असल में वह किसी का दोस्त नहीं होता।” वाह! क्या गहरी सोच है! नेहरू जी की ‘नॉन-अलाइनमेंट’ पॉलिसी और आज की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’—दोनों का नतीजा वही हुआ—सबके लिए जरूरी बनने निकले थे, लेकिन सबके लिए गैर-जरूरी बन गए।


अब दोष केवल नीति का ही नहीं है। सच तो यह है कि अगर लोग आपको बिना जोखिम के चोट पहुँचा सकते हैं, तो शायद वजह यह है कि आप इतने ताकतवर नहीं हैं कि पलटवार कर सकें। उदाहरण? अमेरिका भारत पर टैरिफ लगाता है—क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा है। पर चीन पर टैरिफ नहीं लगाता, क्योंकि अगर चीन नाराज़ हो गया तो क्रिटिकल मिनरल्स रोक देगा और उल्टा पलटवार भी करेगा। साफ है—दुनिया की दोस्ती भी ताक़त देखकर निभाई जाती है, और शायद हमारी भी। लोग मुझे धोखा दे जाते हैं, और मैं पलटकर जवाब देने के बजाय बस “फिर से भरोसा करने” का व्रत ले लेता हूँ।


असल में मेरी मित्रता पॉलिसी हमेशा से अधकचरी रही है। मैंने सोचा कि दोस्ती भावनाओं से निभाई जाती है, इसमें दिमाग लगाने की क्या ज़रूरत? लेकिन नतीजा यह हुआ कि मैं वही गलती कर बैठा जो भारत ने नेहरू जी के ज़माने में की थी—“आदर्शों में जीना और यथार्थ में पिट जाना।”


अब अनुभव सिखा रहा है कि दोस्त कई तरह के होते हैं:


दिल से जुड़े दोस्त – ये वैसे हैं जैसे रूस और भारत: दशकों पुराना भरोसा।

दिमाग से जुड़े दोस्त – ये भारत-अमेरिका वाले रिश्ते जैसे हैं: रणनीति है, इमोशन नहीं।

मजबूरी वाले दोस्त – पड़ोसियों की तरह। चाहो या न चाहो, रोज़ का सामना है।

नेटवर्किंग फ्रैंड्स – पार्टियों और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दिखाने के लिए।

और अंत में, स्वार्थी दोस्त – जो केवल तब याद करते हैं जब उन्हें फायदा चाहिए।


अब मैंने ठान लिया है कि अपनी मित्रता नीति में सुधार करूंगा। यानी:


1. भावनात्मक भरोसे के लिए दिल से जुड़े दोस्त रखना।

2. रणनीतिक लाभ के लिए दिमाग से जुड़े दोस्त बनाना।

3. मजबूरी वाले रिश्ते निभाना।

4. नेटवर्किंग फ्रैंड्स से अपनी इमेज बढ़ाना।

5. और स्वार्थी दोस्तों से उतना ही सतर्क रहना चाहिए जितना भारत चीन से रहता है।


भारत की विदेश नीति का निचोड़ है—“सबसे दोस्ती रखो, पर अपनी पहचान और हित सबसे ऊपर रखो।”

और मेरी नीति का निचोड़ यह है—“सबसे दोस्ती रखो, दिल से भरोसा निभाओ, पर दिमाग से संतुलन साधो।”


अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में मैं दिल से दोस्ती, दिमाग से दोस्ती और मजबूरी वाली दोस्ती का संतुलन साध पाता हूँ या फिर मेरे रिश्ते भी संयुक्त राष्ट्र की मीटिंग की तरह लंबी-चौड़ी भाषणबाज़ी और शून्य परिणाम में बदल जाते हैं।


मंगलवार, 15 जनवरी 2019

एक दिन की छुट्टी



रूम में बिखरी सिगरेट की डिब्बियों,
राख से भरी ऐशट्रे
और सिगरेट के बुझे ठुठ्ठों के साथ
उस बुरी लत को भी फेंकने के लिए
एक दिन की छुट्टी चाहता हूं।

बेड पर बेतरतीब पड़ी चादर
हैंगर में लटकते हुए कपड़ों के साथ
मैल से काले पड़ गए मन को धोने के लिए
एक दिन की छुट्टी चाहता हूं।

अलमारी में उलटी-पुलटी पड़ी किताबों
रोजमर्रा के समान
और तेल-कंघी के साथ
दिमाग में भरे उल्टे-सीधे विचारों को
व्यवस्थित करने के लिए
एक दिन की छुट्टी चाहता हूं।

एक दिन की छुट्टी चाहता हूं
ताकि सारा फालतू का तनाव भुलाकर
सारे व्यर्थ के काम छोड़कर
कुछ अच्छा सोचूँ, अच्छा करूँ, अच्छा बनूँ
या वो करूँ
जो पिछली एक दिन की छुट्टियों में नहीं कर पाया।

उनकी मुझसे पटती है मेरी उनसे नहीं



वो कोशिश करते हैं
मेरे साथ मेरे जैसा होने की
बातें करते हैं मेरे जैसी
मुझे लगने भी लगते हैं-
जैसा मैं हूं, कुछ देर के लिए।

थोड़ी देर बाद बदलकर गौतम हो जाते हैं
फिर शुभांक, तिवारी और जोशी
जिसके साथ हों उसके जैसे लगते हैं।

बर्फ की छुअन सा कंपकंपा देता है उनका स्पर्श
पूस की सर्दी में
गर्मी में पसीना छुड़ाता है उनका सानिध्य
कुछ कुछ मौसम जैसे ही हैं वो

आकार निश्चित है उनका
पर आकृति अनिश्चित
तरल पदार्थ की भांति
हर सांचे में ढल जाते हैं
पानी भी जमकर बर्फ हो जाता है
पर वो कभी ठोस नहीं होते।

वो निष्प्रयास ही गधों के झुंड में गधे
और सुअरों के बीच सुअर हो लेते हैं
मैं लाख कोशिशों के बाद भी
दूर से ही 'हंसों के बीच कौआ' दिखता हूं

उनकी मुझसे पट जाती है
क्योंकि मेरे सामने वो मेरे जैसे हो जाते हैं
मेरी उनसे नहीं पटती
क्योंकि वो कभी खुद जैसे नहीं होते


चंदा वापसी


आजकल मैं चंदा वालों से परेशान हूं। नहीं ये चंदा मांगते नहीं, वापस करने आते हैं। अभी आज कुछ लोगों ने दरवाजा खटखटाया तो मैंने खोला। वो बोले- "गणेश उत्सव समिति से आए हैं।" 

  मैं पर्स से 50 का नोट निकाल कर उनको देने लगा तो उन्होंने कहा- "अरे भाई साहब, हम चंदा लेने नहीं देने आए हैं। अब बिना मांगे ही इतना चंदा इकट्ठा हो जाता है कि हमें लेने नहीं आना पड़ता। उल्टे बचा हुआ पैसा घर घर बांटने जाना पड़ता है।"

  उनमें से एक आदमी रसीद पर कलम रखते हुए बोला- बताइए कितने लेने की श्रद्धा है?

   मैं उनकी तरफ मुंहबाए देखने लगा। उसने फिर कहा- अरे बताइए, बताइए। धरम का काम है।
 मैंने कहा- एक भी नहीं।धर्म का काम हो चाहे अधर्म का, मैं एक रुपिया नहीं ले सकता। आप चुपचाप वापस चले जाइए।

  उनमें से एक बोला- धरम का पैसा नहीं लोगे? बेवकूफ हो क्या? अरे धर्म के पैसे का महात्म्य नहीं जानते ? जानते हो धरम के पैसों से कितनी बरकत होती है? चिन्दी चोर इसी धरम के पैसे से बड़े बड़े मठ बनाकर बाबा बन जाते हैं। लम्बी फोर व्हीलर गाड़ी और सैकड़ों चेले-चपाटियों के साथ ऐश करते हैं। ये धरम के पैसों का ही महात्म्य है जो चोर-उचक्कों को साधु बना देता है। मुहल्ले के आवारा लोगों के द्वारा चंदे के नाम पर इकट्ठा किया गया धरम का पैसा ही महीनों दारू का खर्चा उठाता हैं। और इसकी सबसे बड़ी महिमा कि ये टैक्स फ्री है।

   महात्म्य सही भी होता है, इसे लेकर मेरे मन में शंका है। गीता में लिखा है 'कर्मण्येवा धिकारस्ते मा फलेषु कदाचन... और उसके महात्म्य में लिखा है कि गीता के प्रथम अध्याय के सुनने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उसके प्रताप से बुरे काम करने वाला पापी सुशर्मा मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। जब मोक्ष के लिए कर्म देखे ही नहीं जा रहे तो फिर कर्मण्येवा धिकारस्ते... लिखने का क्या मतलब?

   इसलिए मुझे उनके बताए गए धरम के पैसों के महात्म्य पर यकीन नहीं हुआ। मैंने कहा- कुछ भी हो। मैं एक पैसा नहीं लूंगा।

  वो बोले - तो हम इस बचे हुए पैसे का क्या करें?

  मैंने कहा- आप लोगों ने गणेश उत्सव के काम में लापरवाही की है तभी इतना पैसा बचा है। व्यवस्था टाइट रखते और ढंग से खर्चा करते तो ये पैसा नहीं बचता। खर्चे में कंजूसी करोगे तो बचेगा ही"

  मेरी बात पर वो भड़क गए। बोले- कैसी बात करते हैं। हमने पूरी व्यवस्था टाइट की थी। 8 फुट की मूर्ति लाए थे। पूरे मैदान में शानदार टेंट लगवाया। दस-दिन तक डीजे चिल्लाता रहा। पटाखे-फुलझड़ी सब में दिल खोलकर खर्चा किया। कोई कंजूसी नहीं की। समान खरीदने से ज्यादा तो लड़कों के चाय नास्ते में खर्चा किया। रोज शाम को सबको दारू भी पिलाते थे। अब इतना सब करने के बाद भी बच गए तो हम क्या करें?

   उनकी बातों में सच्चाई थी। सच के आगे मैं झुक जाता हूं। लेकिन मैं न धर्म को मानता हूं न ही भगवान को। फिर भला धरम के पैसे कैसे ले लूं। किसी भी हालत में मैं अपना अधर्म भ्रष्ट नहीं कर सकता। मैंने उनसे कहा- "जो पैसा तुम्हारे पास है उसे आपस में बांटकर रख लो। मुझे परेशान न करो। तुमने कमीशन नहीं खाया, इसी वजह से पैसा बच गया है।"

   उनमें से एक अकड़कर बोला- यार कैसी बातें कर रहे हो तुम। चंदा इकट्ठा करने से लेकर मूर्ति विसर्जन के किराए तक सबमें कमीशन खाया गया है। मैंने खुद 10 हजार की मूर्ति 13 हजार में खरीदवा कर 33 परसेंट कमीशन खाया। तुमको लेना पड़ेगा। (मुड़कर रसीद काटने वाले आदमी से ) अरे तुम काटो इनके नाम की।

   मैंने गिड़गिड़ाकर कहा- अरे यार मेरी मजबूरी समझो। मैं नहीं ले सकता। स्टूडेंट हूं। इस पैसे को खर्चा कैसे करूँगा। नया महीना शुरू हुआ है। घर से पैसे आ गए हैं। तुम किसी जरूरतमन्द फैमिली वाले को दे दो।

   उन्होंने लगभग डांटते हुए कहा- उत्सव में स्टूडेंट लोगों का ही ज्यादा सहयोग होता है। लास्ट में भंडारे में फैमिली वालों से ज्यादा तो यही रहते हैं। तुमको लेना ही पड़ेगा।

   मैंने डर गया। मैंने झट से दरवाजा बन्द कर लिया। उन्होंने खूब खटखटाया पर मैंने दुबारा नहीं खोला। फिर 51 रुपए की रसीद दरवाजे के छेद से अंदर गिराकर चले गए।